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युवराज सिंह: सीमित ओवरों के क्रिकेट में भारत के असली नायक

Written By Press Trust of India (भाषा) | Mumbai | Published:

सीमित ओवरों के क्रिकेट में भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक युवराज सिंह का टेस्ट क्रिकेट में सफल नहीं होना एक रहस्य ही रहेगा।

चंडीगढ़ के इस खिलाड़ी को भारत को दो विश्व कप का खिताब दिलाने के लिए याद किया जाएगा। एकदिवसीय विश्व कप 2011 के दौरान वह कैंसर से पीड़ित थे और खांसते समय खून के थक्के बाहर निकल रहे थे।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले इस खिलाड़ी का टेस्ट करियर एकदिवसीय करियर की तरह परवान नहीं चढ़ा। उन्होंने 40 की जगह अगर 100 टेस्ट खेले होते तो उनका कद क्या होता इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। 

उनकी बल्लेबाजी में कलात्मकता के साथ गजब की ताकत थी। मैदान से बाहर भी वह अक्सर सुर्खियों में रहते थे। अनुकूल और प्रतिकूल समय में खुद को प्रासंगिक बनाये रखना उनके आकर्षक चरित्र का हिस्सा था। 

बायें हाथ के बाल्लेबाज वैसे ही आकर्षक होते है और अगर उनके पास ताकत हो तो यह उन्हें और भी खास बनाता है। 

युवराज को क्रिकेटर बनाने का सपना उनके पिता योगराज सिंह का था। कोच देश प्रेम आजाद के शागिर्द योगराज सिंह का अंतरराष्ट्रीय करियर कपिल देव की सफलता के कारण परवान नहीं चढ़ा और महज एक टेस्ट मैच खेलने वाले योगराज अपनी असफलता (अधिक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेल पाना) को युवराज की सफलता में बदलना चाहते थे । 

बचपन में युवराज जब रोलर स्केट प्रतियोगिता में चैम्पियन बने तो योगराज ने उनके खिताब को कूड़े में फेंक दिया ऐसे में युवराज के पास क्रिकेट में सफल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

वह क्रिकेट के मैदान में आये और शानदार खेल से दुनिया भर के प्रशंसकों को दिवाना बनाया।

कपिल देव का 1983 में भारतीय क्रिकेट में अगर बड़ा योगदान था तो 2011 में वह काम युवराज सिंह ने किया। इस विश्व कप में उन्होंने 300 से ज्यादा रन और 15 विकेट चटका कर भारत को चैम्पियन बनाने में अहम भूमिका निभाई। 

युवराज ने अपनी पहचान बड़े मैचों के खिलाड़ी के तौर पर बनायी। इंग्लैंड के खिलाफ लार्ड्स के मैदान पर नेटवेस्ट ट्राफी के फाइनल में खेली गयी पारी हो या फिर टी20 विश्व कप (2007) के करो या मरो मैच में इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्राड के खिलाफ ओवर में छह छक्के लगाने के करिश्मे के साथ 2011 एकदिवसीय विश्व कप के क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अर्धशतकीय पारी उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है। 

भारतीय टीम में वीरेन्द्र सहवाग के अलावा युवराज को गेंद पर सबसे तेज प्रहार के लिए जाना जाता था। 

युवराज को एक तरह से इंडियन प्रीमियर लीग के शुरू होने का श्रेय भी जाता है। अगर उन्होंने टी20 विश्व कप में छह छक्के नहीं लगाये होते तो शायद ललित मोदी के दिमाग में आईपीएल शुरू करने का विचार ही नहीं आता। 

हालांकि यह भी एक रहस्य ही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना सफल होने वाले युवराज आईपीएल में अपनी ख्याति के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सके। टीमें उनके लिए बड़ी रकम खर्च करती थी लेकिन वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। 

ऐसा ही नजारा टेस्ट मैचों में भी दिखा। रंगीन कपड़ों में दुनिया भर के गेंदबाजों के छक्के छुड़ाने वाला यह बल्लेबाज जब सफेद पेशाक (टेस्ट मैच) में मैदान में उतरता था तो आत्मविश्वास की जगह खुद की काबिलियत पर उसे संदेह होने लगता था। 

धीमी पिचों पर भी उन्हें बल्लेबाजी में परेशानी होती थी और मुथैया मुरलीधरन के खिलाफ असरदार प्रदर्शन नहीं कर पाना इसका सबूत है।

तकनीकी समस्याओं के बाद भी 300 से अधिक एकदिवसीय मैच खेलना उनकी सफलता को दर्शता है। 

एकदिवसीय विश्व कप (2011) में मैन ऑफ द सीरीज रहने के बाद उन्हें कैंसर का पता चला। उन्होंने हालांकि इससे उबर कर मैदान में वापसी की लेकिन वह पहले वाले युवराज नहीं रहें। 

बांग्लादेश में 2014 में धीमी पिच पर खेले टी20 विश्व कप में श्रीलंका के खिलाफ 21 गेंद में 11 रन की उनकी पारी भारत की हार का कारण बनी।

इसके बाद भी वह टीम से अंदर बाहर होते रहे लेकिन उनकी फिटनेस में गिरावट आ गयी थी। 

इन सब के बावजूद युवराज एकदिवसीय क्रिकेट में भारत के महान खिलाड़ियों में से एक रहेंगे। उनका नाम सचिन तेंदुलकर, कपिल देव, विराट कोहली और महेन्द्र सिंह धोनी जैसे धुरंधरों की श्रेणी में रहेगा। 
 

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