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राफेल पर राहुल गांधी का झूठ बेनकाब, 'डील में ऑफसेट पार्टनर को कोई नकद पैसा नहीं दिया गया'

Written By Ayush Sinha | Mumbai | Published:

देश के सियासी गलियारों की आबो हवा में सबसे ज्यादा तड़कता-भड़कता मुद्दा आजकल 'राफेल सौदा' है। लोकसभा चुनाव नजदीक हैं ऐसे में विपक्षी पार्टी केंद्र सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। काफी लंबे वक्त से कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी एक के बाद एक लगातार केंद्र की मोदी सरकार पर राफेल सौदे को लेकर गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन आज रिपब्लिक भारत ने राहुल गांधी के झूठ को ही बेपर्दा कर दिया है।

राहुल गांधी के झूठ का खुलासा राफेल प्राइसिंग कमेटी के पूर्व अध्यक्ष एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा ने रिपब्लिक भारत पर ''पूछता है भारत'' में अर्नब गोस्वामी के साथ बातचीत में किया। उन्होंने राफेल डील में ऑफसेट की उस प्रक्रिया पर प्रकाश डाला जिससे पूरा देश अंजान है। जिसका हवाला देकर राहुल गांधी बार-बार अनिल अंबानी पर आरोप लगाते हैं।

ऑफसेट को लेकर प्राइसिंग कमेटी के पूर्व अध्यक्ष एयर मार्शल(रिटा.)एसबीपी सिन्हा ने क्या कहा?

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''मैं एक चीज बहुत क्लीयर करना चाहता हूं कि ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) और ऑफसेट दो अलग-अलग चीजें हैं। ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी आप पैसे देकर खरीदते हैं और ऑफसेट क्रेडिट देते हैं। ऑफसेट में पैसे नहीं लगते हैं, मैंने देखा इतने लोग बात कर रहे हैं कि इतना करोड़ पैसा उसको गया लेकिन ऑफसेट में पैसे नहीं लगते हैं। जब आप कोई प्रोक्योरमेंट करेंगे विद ऑफसेट या ऑफसेट के बिना तो आपकी कीमत थोड़ी बढ़ेगी 5 या 10 परसेंट ग्लोबल स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक, जिसे ऑफसेट लोडिंग कहते हैं। ऑफसेट इम्प्लीमेंट करने में जो कंपनी को कीमत आती है उसे ऑफसेट लोडिंग कहते हैं।''

उन्होंने कहा, ''जो ऑफसेट क्रेडिट्स होते हैं उसकी वैल्यू आपके कॉन्ट्रैक्ट के परसेंटेज से होती है। आम तौर पर जो कॉन्ट्रैक्ट होता है उसका 30 परसेंट ऑफसेट दिया जाता है और राफेल में और इसके पिछले में भी 50 परसेंट ऑफसेट था। यानी अगर आपके प्रोक्योरमेंट की कीमत 59 हजार करोड़ थी तो उसमें से जो मेंटेनेंस, 5 साल की परफॉर्मेंस उसकी कीमत निकाल दीजिए, दो सिमिलेटर हैं वो सब निकालकर जो डायरेक्ट प्रोक्योरमेंट लागत है उसका 50 परसेंट। ऑफसेट क्रेडिट होंगे उसमें पैसे नहीं दिए जाएंगे। ऑफसेट क्रेडिट का मतलब ये होता है कि जो विदेशी कंपनी हैं वो इंडिया से प्रोडक्ट्स खरीदेगी, सर्विसेज खरीदेगी या DFI डालेगी या ToT देगी, DRDO या किसी और इंडियन कंपनी को, इसकी वैल्यू उस पैसे के बराबर होनी चाहिए इसलिए इसको ऑफसेट क्रेडिट कहा जाता है इसमें पैसे एक्सचेंज नहीं होते हैं।''

डील में अनिल अंबानी का रोल...

''एयर मार्शल(रिटा.)एसबीपी सिन्हा ने बताया कि जहां तक ऑफसेट पार्टनर का सवाल है, ऑफसेट पार्टनर को चुनना जो विदेशी कंपनी जिसको हम लोग OEM बोलते हैं उसकी पसंद होती है, ये डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिजर में साफ-साफ लिखा है। इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है। राफेल की बात करें तो एक दसॉल्ट के साथ कॉन्ट्रैक्ट है और उसके तीन टीयर वन वेंडर्स हैं। एक है थैलिस जो एवियॉनिक्स बनाता है, एक है सैफरन जो इंजन बनाता है और एक MBD है जो वैपंस दे रहा है। तो इन सब ने उनके कॉन्ट्रैक्ट में जितनी जितनी कीमत है उसके प्रोडाटा बेसिस पर ऑफसेट को बांट लिया है। और इन सबके अपने-अपने ऑफसेट पार्टनर हैं। इन चारों के ऑफसेट पार्टनर मिलाकर 70-80 कुछ पार्टनर्स हैं। जहां तक अनिल अंबानी का सवाल है, अनिल अंबानी के साथ दासो का एक जॉइंट वेंचर है उस जॉइंट वेंचर में राफेल नहीं बना रहे हैं और ये जो हमारे 36 राफेल हैं उसमें किसी भी जहाज में एक नट-बोल्ट तक नहीं आ रहा है। ये सबकुछ फ्रांस से बनकर फ्लाई-वे जहाज है''

राफेल प्राइसिंग कमेटी के पूर्व अध्यक्ष 'एयर मार्शल(रिटा.) एसबीपी सिन्हा ने चार EXCLUSIVE खुलासे किए।

खुलासा नंबर-1 : चिट्ठी लिखने वाले अफसर का राफेल डील से रिश्ता नहीं

खुलासा नंबर-2 : डील में ऑफसेट पार्टनर को कोई नकद पैसा नहीं दिया गया

खुलासा नंबर-3 :  रक्षा मंत्रालय को राफेल डील पर कोई आपत्ति नहीं थी

खुलासा नंबर-4 : वायुसेना की साख पर बट्टा लगाने की कोशिश की गई

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सच्चाई सामने आने के बाद 'पूछता है भारत' के कार्यक्रम में रिपब्लिक भारत के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने उठाए यह पांच सवाल... 

  1. राहुल गांधी और अखबार ने आधा सच जान-बूझ कर दिखाया या गलती से ? 
  2. क्या रक्षामंत्री ने राफेल डील का विरोध किया था, या फिर ये झूठ है?
  3. जिस अधिकारी के बयान पर राहुल का दावा, वो राहुल के साथ या राहुल झूठे?
  4. जब अधिकारी ने कहा PMO का हस्तक्षेप नहीं तो राहुल मांगेंगे माफी? 
  5. अगर PMO का हस्तक्षेप नहीं, तो क्या राहुल ने झूठ फैलाया
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