General News

शरद अरविंद बोबडे : चुनौतीपूर्ण समय में मुश्किल सफर पर निकला कानून का हाकिम

Written By Press Trust of India (भाषा) | Mumbai | Published:

निजता के अधिकार के पक्षधर, न्यायपालिका तक आम आदमी की पहुंच न होने से परेशान, पर्यावरण को बचाने के लिए फिक्रमंद, अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चल रही चर्चाओं से चिंतित और अयोध्या के मसले को आस्था और धर्म का नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ कानूनी मसला मानने वाले न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे इस चुनौतीपूर्ण समय में देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े हाकिम के तौर एक मुश्किल सफर पर निकल रहे हैं।

महाराष्ट्र के नागपुर जिले में वकीलों के परिवार में 24 अप्रैल 1956 को जन्मे शरद के दादा एक वकील थे। उनके पिता अरविंद बोबडे 1980 और 1985 में महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल थे। उनके बड़े भाई स्वर्गीय विनोद अरविंद बोबडे उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील और उम्दा संविधान विशेषज्ञ थे।

शरद अरविंद बोबडे ने नागपुर के ही एसएफएस कालेज से स्नातक स्तर की पढ़ाई करने के बाद 1978 में नागपुर विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की। किताबी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 13 सितंबर 1978 में वकील के तौर पर पंजीकरण कराया। अपने करियर के दौरान उन्होंने बम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ में प्रैक्टिस की और करीब 20 साल तक तमाम कानूनों की पेचीदगियों से वाकिफ होने और बहुत से मुकदमों में हार जीत के पड़ावों से गुजरने के बाद 1998 में सीनियर एडवोकेट बने।

वकालत के अपने सफर में उन्होंने वर्ष 2000 में एक और पड़ाव पार किया, जब 29 मार्च 2000 में उन्हें बम्बई उच्च न्यायालय में अतिरिक्त जज बनाया गया। कुछ बरस बाद उन्होंने अपने करियर में एक और मील का पत्थर पार किया, जब 16 अक्टूबर 2012 को उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। इसके छह माह बाद ही 12 अप्रैल 2013 को वह एक कदम और आगे बढ़े और देश की शीर्ष अदालत में न्यायाधीश बने।

देश के 47वें प्रधान न्यायाधीश पद के लिये मनोनीत न्यायमूर्ति शरद अरविन्द बोबडे को राष्ट्रपति राम नाथ कोविद 18 नवंबर को नये प्रधान न्यायाधीश पद के रूप में शपथ दिलायेंगे, लेकिन इस सम्मानित पायदान पर पहुंचने से पहले ही न्यायमूर्ति बोबडे का नाम करीब 135 साल पुराने और राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का 15 नवंबर तक ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाली संविधान पीठ के सदस्य के रूप में इतिहास में दर्ज होने जा रहा है।

अयोध्या मामले की सुनवाई और धर्म को लेकर चल रही तमाम चर्चाओं के बीच न्यायमूर्ति बोबडे का मानना है कि भारत में कानून का शासन ही धर्म है और यह व्यवस्था प्राचीन भारत में ही अपनी जड़े जमा चुकी थी। इस संदर्भ में वह महाभारत का जिक्र करते हुए गांधारी के इन शब्दों ‘‘जो सही है, वही जीते’’ को याद करते हैं और इसे धर्म के शासन के सबसे पहले वक्तव्यों में से एक मानते हैं और उच्चतम न्यायालय का ध्येय वाक्य भी यही है।

न्यायिक हलकों में न्यायमूर्ति बोबडे का नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है और जनहित से जुड़े कई मामलों पर उनके आदेश एक नजीर हैं। उनकी सुलझी हुई राय और कानून की समझ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न्यायमूर्ति बोबडे उस तीन सदस्यीय समिति के अध्यक्ष थे जिसका वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिये गठन हुआ था। इस समिति के अन्य सदस्यों में दो महिला न्यायाधीश भी शामिल थीं।

DO NOT MISS