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‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ की रिलीज रुकना नियमों के अभाव में फिलहाल कठिन : दिलीप चेरियन

Written By Press Trust of India (भाषा) | Mumbai | Published:

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी बायोपिक फिल्म की चुनाव के दौरान होने वाली रिलीज को लेकर विवाद उठ गया है और विपक्षी दलों ने इसे ‘जनमत को प्रभावित’ करने वाला चुनावी हथकंडा बताते हुये इसकी रिलीज रोकने की चुनाव आयोग से मांग की है। विज्ञापन जगत के मशहूर ‘एड गुरु’ दिलीप चेरियन का मानना है कि निर्वाचन नियमों के दायरे में फिलहाल बायोपिक फिल्में नहीं है इसलिये अब यह देखना होगा कि आयोग इस मामले में क्या रुख अपनाता है। पेश हैं चेरियन से इस मुद्दे पर भाषा के पांच सवाल :

प्रश्न : बायोपिक फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ की अप्रैल में संभावित रिलीज को रोकने की जोर पकड़ती मांग कितनी उचित है?

  • उत्तर : दिक्कत यह है कि चुनाव आचार संहिता और निर्वाचन नियमों में ‘पेड न्यूज’ और ‘सोशल मीडिया’ सहित अन्य माध्यमों को तो शामिल किया जा चुका है। लेकिन ‘बायोपिक फिल्म’ ऐसा विषय है जो अब तक निर्वाचन नियमों के दायरे में नहीं है। अब देखना होगा कि आयोग नियमों में संशोधन कर इसे भूतलक्षी प्रभाव से लागू करता है या कोई अन्य तरीका अपनाता है। फिलहाल मौजूदा नियमों के तहत इसकी रिलीज रुक पाना कठिन दिख रहा है।

प्रश्न : प्रधानमंत्री मोदी के अलावा क्या किसी अन्य प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए पहले कभी ऐसी फिल्म बनायी गयी ?

  • उत्तर : मुझे याद नहीं है कि पद पर रहते किसी अन्य प्रधानमंत्री पर बायोपिक बनी हो। विषय की पड़ताल करने के बाद ही मैं कुछ कह पाऊंगा। इससे पहले डॉ मनमोहन सिंह पर जरूर फिल्म बनी थी लेकिन यह फिल्म उनके प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद बनायी गयी।

प्रश्न : ‘व्यक्ति विशेष’ के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्मों के दायरे में राजनीतिक शख्सियतों को भी शामिल करना कितना जायज है ?

  • उत्तर : बायोपिक की विषयवस्तु के प्रचलित सिद्धांत के अनुसार ऐसी किसी भी शख्सियत पर फिल्म बनायी जा सकती है जिसका जीवन ऐसे विविध आयामों वाले रंगो से भरा हो, जिनकी जानकारी से जनसामान्य अपरिचित हो। इसमें समाज को प्रोत्साहित करने वाले सकारात्मक आयाम और समाज को सचेत करने वाले नकारात्मक आयाम शामिल हैं। इसमें राजनीति, खेल या समाज के किसी भी वर्ग के लोगों को फिल्म की ‘थीम’ बनाया जा सकता है।

प्रश्न : क्या इसे राजनीतिक लाभ वाले प्रचार के नये तरीके के रूप में आजमाया गया राजनीतिक दलों का अभिनव प्रयोग माना जाये या ‘हथियार’ के तौर पर देखा जाये?

  • उत्तर : विज्ञापन जगत में प्रचलित ‘टूल मैनेजमेंट’ के नियमानुसार किसी भी ‘टूल’ को तभी प्रभावी माना जाता है जब उसका सकारात्मक असर हो, जिसे देखकर लोगों के मन मस्तिष्क पर बेहतर असर हो और लोग उससे प्रोत्साहित हों। लेकिन महज फिल्मों की फेहरिस्त में एक और फिल्म जोड़ने के लिये फिल्म बनायी जाये तो इसे प्रभावी ‘टूल’ नहीं माना जाता है। मसलन जयललिता पर भी बायोपिक बनाने की बात चल रही है। राजनीति में आकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनने वाली फिल्म जगत की शख्सियतों पर फिल्म बनाना, फिल्म की कामयाबी के लिहाज से ‘लाभप्रद’ माना जाता है क्योंकि ऐसे लोगों के पास फिल्मों में रुचि रखने वाले प्रशंसकों का एक तबका पहले से मौजूद होता है। इस तबके में राजनीति में रुचि रखने वाला वर्ग भी शामिल होकर फैन फॉलोविंग बढ़ाता है। इससे साफ है कि राजनीतिक व्यक्तियों पर आधारित फिल्में जनमानस को एक हद तक प्रभावित तो करती हैं।

प्रश्न : नेताओं के राजनीतिक फायदे के लिये बायोपिक फिल्मों को हथियार बनाने में फिल्म और विज्ञापन जगत की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?

  • उत्तर : चुनाव के समय, पद पर आसीन किसी व्यक्ति पर बनी फिल्म को ‘विज्ञापन’ मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिये। यह जरूर है कि अगर चुनाव आयोग इसे प्रचार का तरीका मानने के विषय पर कोई रास्ता निकालता है तो इससे अन्य माध्यमों (सोशल मीडिया आदि) के साथ फिल्म जगत के भी चुनावी उपयोग और दुरुपयोग पर छायी धुंध साफ हो सकेगी।
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