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#MeeToo: कंपनियां शीर्ष अधिकारियों को रखते समय उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर भी गौर करें

Written By Digital Desk | Mumbai | Published:

यौन उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे मीटू अभियान के देश भर में रफ्तार पकड़ने के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को शीर्ष स्तर पर अधिकारियों को नियुक्त करते समय उनके बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) के अलावा सोशल मीडिया प्रोफाइल की जांच भी करनी चाहिये . 

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर डाले गये पोस्ट संभावित उम्मीदवार के व्यक्तित्व और व्यवहार के बारे में बताते हैं.

टीम लीज सर्विसेज की वरिष्ठ उपाध्यक्ष नीति शर्मा ने पीटीआई-भाषा को बताया, "आज के समय में नियुक्ति प्रक्रिया में सोशल मीडिया की अहम भूमिका है। सोशल मीडिया पर डाले गये पोस्ट, टिप्पणी इत्यादि उम्मीदवार के व्यवहार और व्यक्तित्व की ओर इशारा करते हैं. " 

उन्होंने कहा कि इससे न सिर्फ उम्मीदवार के ऊपर लगे दोषों का पता चलता है बल्कि वह किसे फॉलो करता है, क्या पढ़ता है और कहां छुट्टियां मनाता है, इस तरह की बहुत सी बातें पता चलती हैं .

उदाहरण के तौर पर, कई वैश्विक कंपनियों वरिष्ठ और मध्यम स्तर पर कर्मचारियों की नियुक्ति में उनके व्यक्तित्व के बारे में जानने के लिये उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि की जांच-पड़ताल करती हैं .

सेकुर क्रेडेंशियल्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) राहुल बेलवालकर ने कहा कि उम्मीदवार के बारे में उसकी पुरानी कंपनी में पता करने के अलावा ड्रग (नशा) और मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराया जाना चाहिये . इसके अलावा, सोशल मीडिया गतिविधियों, पता, शैक्षिक योग्यता, आपराधिक इतिहास आदि के बारे में भी पता करना चाहिये .

मेट्टल के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी केतन कपूर ने कहा कि वरिष्ठ पदों पर बैठे कर्मचारियों की नियुक्ति कड़ी जांच-पड़ताल के बाद होनी चाहिये . 

इससे पहले न्यायमूर्ति एस जे कथावाला ने यह टिप्पणी निर्देशक विकास बहल द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा  कि # मी टू अभियान केवल पीड़िताओं के लिए है और किसी को भी इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए.  

अदालत ने कहा,‘‘हम नहीं चाहते कि कोई भी अपने हित साधने के लिए महिला का इस्तेमाल करे.’’ उच्च न्यायालय ने कहा कि हालांकि # मी टू अभियान प्रशंसनीय है लेकिन किसी को भी इसका दुरूपयोग नहीं करना चाहिए.

न्यायमूर्ति कथावाला ने कहा,‘‘इस अभियान का दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिए. यह पीड़िताओं के लिए है, किसी और के लिए नहीं है. यही कारण है कि इस मुद्दे पर दिशानिर्देश बनाये जाने की आवश्यकता है.’’ अदालत ने महिला को 23 अक्टूबर को एक हस्ताक्षरित बयान सौंपने के भी निर्देश दिये जिसमें कहा जाये कि वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है.

फैंटम फिल्म्स की स्थापना 2011 में कश्यप, मोटवानी, बहल तथा निर्माता मधु मंटेना ने की थी. कंपनी द्वारा बनाई गई फिल्मों में ‘‘लुटेरा’’, ‘‘हंसी तो फंसी’’ और ‘‘क्वीन’’ शामिल हैं. मी टू अभियान के बीच फैंटम फिल्म्स की एक पूर्व कर्मचारी द्वारा बहल का नाम लिये जाने के तुरन्त बाद कश्यप और मोटवानी ने इस प्रोडक्शन हाउस को भंग करने का फैसला किया था.

एक अज्ञात महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि बहल ने 2015 में ‘‘बाम्बे वेलवेट’’ फिल्म के प्रोमोशनल टूर के दौरान गोवा में उसका यौन उत्पीड़न किया था.

( इनपुट - भाषा से )

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