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बुलंदशहर हिंसा में शहीद की पत्नी ने कहा-'आरोपियों को माला पहना कर स्वागत करने वाले लोगों को एक भी देशभक्त का नाम नहीं पता होगा'

Written By Digital Desk | Mumbai | Published:


बुलंदशहर हिंसा में शहीद हुए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या के आरोपियों को माला पहनाकर स्वागत करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इसे किसी भी लोकतंत्र में जायज कैसे ठहराया जा सकता है। इंसानियत के इतिहास के किस अध्याय में ये लिखा है कि हत्या के आरोपियों का हीरो की तरह स्वागत किया जाए। ये तो बड़े कलंक की बात है कि कुछ लोगों ने मिलकर अपनी ड्यूटी निभा रहे एक इंस्पेक्टर की सरेआम हत्या कर दी और उनके हत्या के आरोपियों का इस तरह से स्वागत किया जा रहा है जैसे कोई किला फतह करके लौटे हों। ऐसे लोगों और ऐसी सोच पर शर्म आती है । ये कैसे लोग हैं और कैसा समाज बना रहे हैं ? क्या ऐसे समाज में स्वस्थ तरीके से सांस लिया जा सकता है? यकीनन नहीं लिहाजा ऐसी सोच को बदलना होगा, नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा जब धरती से इंसानियत खत्म हो जाएगी ।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर हिंसा के आरोपी जब जमानत पर जेल से बाहर आए तो जय श्री राम और वंदे मातरम के नारों के बीच उनका स्वागत किया गया। हत्या के इन आरोपियों को लोगों ने फूलों की माला पहनाई और उनकी सेल्फी भी ली। बुलंदशहर जिला जेल से कोर्ट के आदेश के बाद सात आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया। आरोपी जीतू फौजी, शिखर अग्रवाल, हेमू, उपेंद्र सिंह राघव, सौरव और रोहित राघव शनिवार को कोर्ट से जमानत लेकर जैसे ही जेल से बाहर आए। हिन्दूवादी संगठन से जुड़े लोगों ने फूल माला पहनाकर उनका स्वागत किया। इस दौरान भारत माता की जय, वन्दे मातरम और जय श्री राम के नारे लगाए गए।

वहीं  रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क से बात करते हुए बुलंदशहर हिंसा में शहीद की पत्नी ने कहा कि आरोपियों को मला पहनाने वाले लोगों को एक भी देशभक्त का नाम नहीं पता होगा। उन्होंने जज के फैसले पर भी सवाल उठाय़ा और पूछा की क्या यहीं न्याय है?

क्या था बुलंदशहर हत्याकांड ?
पिछले साल तीन दिसंबर को स्याना के चिंगरावटी गांव में गौकशी की अफवाह के बाद हिंसा भड़क गई थी। इस हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस दौरान पूरे गांव में जमकर आगजनी और बलवा हुआ था। बदमाशों ने सरकारी वाहन और पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया था। इस मामले में यूपी पुलिस ने मामला दर्ज कर 38 लोगों को जेल भेजा था। 38 में से 7 आरोपी करीब आठ महीने के बाद जेल से जमानत पर रिहा हो गए। 

ऐसे अगर इसी तरह से कानून का मजाक उड़ाया जाता रहेगा और हिंसा के आरोपियों का सम्मान किया जाता रहेगा तो वो दिन दूर नहीं कि देश में कानून का राज नहीं रह जाएगा। ऐसे में हम सबको सबक लेने की जरूरत है और ऐसे असामाजिक तत्वों का बहिष्कार कर समाज को एक नई दिशा देनी होगी। तभी देश बचेगा , समाज बचेगा और हम सब बचेंगे।

ऐसे में सवाल है यह कि-

  • - क्या ऐसे ही चलेगा देश? 
  • - आरोपियों का सम्मान क्यों ?
  • - हिंसा का महिमामंडन क्यों ?
  • - शहादत का अपमान क्यों ?
  • - कानून का मजाक क्यों ?
  • - इंसानियत के मुंह पर तमाचा क्यों?
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