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देश के विकास के लिए धार्मिक शिक्षा जरूरी या रोजगार शिक्षा? जाने इस मुद्दे पर अर्नब की राय

Written By Digital Desk | Mumbai | Published:

असम सरकार ने अगले एक -दो महीने में 614 सरकार सरकार द्वारा संचालित सभी मदरसों और संस्कृत टोलों  यानी स्कूलों को बंद करने का फैसला किया है। राज्य में चल रहे धार्मिक स्कूलों को कुछ महीनों के भीतर हाई स्कूलों और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में बदल दिया जाएगा।

असम के शिक्षा मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने कहा कि हमने सभी मदरसों और संस्कृत स्कूलों को हाई स्कूलों और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में बदलने का फैसला किया है, क्योंकि राज्य धार्मिक संस्थानों को फंड नहीं दे सकते। हालांकि, गैर सरकारी संगठनों / सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित मदरसे जारी रहेंगे, लेकिन एक नियामक ढांचे के भीतर।

असम सरकार के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसे सवाल उठता है कि क्या हमें धार्मिक शिक्षा की जरूरत है या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की। आपको बता दें कि मदरसे में मजहब की शिक्षा दी जाती है और संस्कृत पाठशाला में वैदिक शिक्षा दी जाती है। असम सरकार का तर्क है कि धार्मिक शिक्षा देना, राज्य का काम नहीं है। इस फैसले का विरोध करने वाले कह रहे हैं कि ये धार्मिक शिक्षा नहीं धर्म पर हमला है। मदरसे और संस्कृत विद्यालय पूरे देश में है  आज असम में विवाद हो रहा है कल पूरे देश में हो सकता है।

इसलिए पूछता है भारत

देश के विकास के लिए धार्मिक शिक्षा जरूरी या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा?
 
क्या स्कूल या मदरसे में धार्मिक शिक्षा से दो संप्रदाय में भेदभाव पैदा होता है

इस समय धर्म वाली शिक्षा की जरूरत या फिर रोजगार वाली शिक्षा की?

अगर एक राज्य में धार्मिक शिक्षा गलत तो दूसरे राज्य में सही कैसे?

अर्नब की राय 

संविधान का ARTICLE 28 कहता है कि जो शैक्षणिक संस्थान राज्य के पैसों से चल रहे हैं वहां धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी तो मदरसा और संस्कृत स्कूल बंद होने पर सियासत क्यों। कुछ लोग कह रहे हैं कि मदरसे बंद करना RSS मॉडल को बढ़ाना है। सरकार तो संस्कृत विद्यालय भी बंद कर रही है फिर इसमें RSS कहां से आ गया? मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों की शिकायत है कि उन्हें नौकरी नहीं मिलती। क्योंकि मदरसा Council of Boards of School Education in India में रजिस्टर नहीं हैं। ऐसी शिक्षा क्यों दी जाए जो नौकरी न दिला पाए। उत्तर प्रदेश में 48 संस्कृत विद्यालय थे जो 16 बंद हो गए। क्योंकि छात्र नहीं हैं। 19 स्कूलों में केवल एक टीचर है कि ऐसे विद्यालयों पर पैसे खर्च करने का क्या फायदा?

इससे पहले योगी सरकार कहती है कि मदरसों में राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है, राष्ट्रध्वज फहराना अनिवार्य है तो विरोध होता है क्या धार्मिक शिक्षा देशप्रेम की इजाजत नहीं देती। संस्कृत विद्यालयों में लोग अपने बच्चों को नहीं भेज रही हैं। बिल्डिंग के मेंटीनेंस का खर्च सरकार उठा रही है। स्टाफ का खर्च सरकार उठा रही है। अगर ऐसे स्कूल रेगुलर स्कूल में बदले जा रहे हैं। तो गलत क्या है? जब पीएम मोदी ने कहा कि मुसलमान बच्चों के एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर हो। तो कट्टरपंथियों ने कहा कि ये मदरसा ख़त्म करने की साजिश है, क्या आप लोग नहीं चाहते कि मदरसे के बच्चे कंप्यूटर सीखें।


 

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