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वो पांच बड़े मुद्दे, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार की हार का कारण बन सकते हैं...

Written By Neeraj Chouhan | Mumbai | Published:

साल 2014, वो साल जब तकरीबन 30 साल बाद देश को पूर्ण बहुमत वाली पहली गैर कांग्रेसी सरकार मिली और इस अविश्वसनीय जीत का श्रेय गुजरात के कद्दावर नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है. तत्कालीन मनमोहन सरकार के दौर में आए दिन कथित स्कैम की खबरों ने कांग्रेस की साख पर ज़बरदस्त चोट पहुंचाई.   

नरेंद्र मोदी नीत भारतीय जनता पार्टी ने मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए लोगों के सामने 'विकास मंत्र और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार' जैसे वायदे करें. जिसका नतीजा ये हुआ कि ना सिर्फ (राष्ट्रीय  जनतांत्रिक गठबंधन) एनडीए के खाते में 336 आई और अकेले बीजेपी बहुमत के साथ 282 सीट जीतने में कामयाब रही. लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक कहावत बहुत मशहूर है कि यहां कुछ भी लंबे समय के लिए नहीं रहता.

ऐसे में जब मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के लगभग साढ़े चार साल पूरे कर लिए हैं और देश एक बार फिर लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. तो सवाल ये उठाता है कि क्या मोदी सरकार 2014 वाला करिश्मा वापस दोहरा पाएगी, अगर नहीं तो वो क्या मुद्दे हैं जो बीजेपी को 2019 में बैकफुट पर धकेल सकते हैं.

राफेल डील...

सितंबर 2016 में भारत और फ्रांस की सरकार के बीच राफेल फाइटर जेट का करार हुआ था. इसका मकसद देश की हवाई सुरक्षा को दुरुस्त करना था. डील के मुताबिक भारतीय वायुसेना को 36 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलने हैं.

लेकिन डील पर उस वक्त सवाल खड़े होने लगे जब कांग्रेस ने दावा किया मनमोहन सरकार के दौरान एक राफेल विमान की कीमत 600 करोड़ रूपये में तय की गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने किसी खास व्यक्ति को 'फायदा' पहुंचाने के लिए इसकी कीमत 600 करोड़ से 1600 करोड़ रूपये कर दी.   

हालांकि सरकार ने दोनों देश में गोपनीयता की संधि होने का हवाला देते हुए विमान की कीमत बताने से इंकार कर दिया था. लेकिन सरकार का यह भी कहना था कि यूपीए सरकार के डील की तुलना में अब की डील में राफेल को ओर आधुनिक बनाने के लिए कई चीजों को जोड़ा गया है, जिस वजह से विमान बनाने की लागत में वृद्धि हुई है. वहीं कांग्रेस समेत विपक्ष इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखता और वो सीधा- सीधा प्रधानमंत्री पर 'भ्रष्टाचार' का आरोप लगा रहा है.

अगर कांग्रेस समेत विपक्ष आम जनता के सामने मोदी सरकार को 'भ्रष्ट सरकार' बताने में कामयाब हो जाता है, तो बोफोर्स घोटले के बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की तरह बीजेपी को भी सत्ता से बेदखल होने पड़ सकता है..   

एससी- एसटी एक्ट पर मचा घमासान...

(Photo: PTI)

जातियों में बांटा हिंदू समाज हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के लिए सिरदर्द रहा है.. चाहे वो 1990 के दौर में मंडल कमीशन लागू होने के बाद 'सवर्ण बनाम अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)' हो या आज के समय में 'दलित और सवर्ण' में उपजा तनाव...

पिछले दिनों अनुसूचित जाति- जनजाति (SC/ST) अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के संशोधन के खिलाफ दलितों में खासा आक्रोश देखने को मिला था, कई जगह हिंसा की घटनाएं हुई. दलित संगठनों और विपक्ष के भारी दबाव के आगे आखिरकार सरकार ने घुटने टेक दिया और संसद के द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एसएसी- एसटी कानून को पहले जैसी स्थिति में बहाल कर दिया गया.

लेकिन उसके बाद वो देखने को मिला जिसकी शायद उम्मीद ना तो मोदी सरकार को होगी और ना ही विपक्ष को.. बीजेपी का कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण (( ब्राह्मण- राजपूत, भूमिहार और वैश्य) ने बागी सुर अख्तियार करते हुए  SC/ST एक्ट को खत्म करने की मांग कर डाली और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल डाला. यहीं नहीं मांग ना पूरी होने पर आने वाले चुनावों सभी पार्टी का बहिष्कार करते हुए नोटा दबाने की धमकी दे डाली. बता दें, देश में सवर्ण समुदाय से ताल्लुक रखने वाले करीब 15 फीसदी लोग हैं..

लिहाजा अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी लोकसभा चुनाव में सवर्ण वोटर क्या सच में बीजेपी को 'सबक' सिखाएंगे या पार्टी सवर्ण वोटरों की नाराजगी को हथियार बनाकर दलित वोटरों को रिझाने में कामयाब हो पाएगी..

 

बेरोजगारी बनी सिरदर्द

अगर साल 2014 का बीजेपी मैनिफेस्टो उठाकर देखें तो दो बातों पर पार्टी ने खासा जोर दिया था, पहला 'विकास' और दूसरा युवाओं के लिए रोजगार देने का वादा..  

लेकिन हाल ही में जारी स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 (एसडब्ल्यूआई) के आंकड़े इन वादों की पोल खोलते हुए नजर आ रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मे पिछले 20 सालों में बेरोजगारी की यह दर सबसे ऊंची है. रिपोर्ट में आगे यह भी दावा किया गया है कि 82% पुरुष और 9 2% महिलाएं प्रति माह 10,000 से भी कम सैलरी मिलती है.  

वहीं केंद्र सरकार द्वारा युवाओं के लिए रोजगार बढ़ने के लिए 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया', 'स्किल इंडिया' और 'स्टार्ट अप' जैसी योजनाएं जोरों शोरों से लॉन्च की गई थी.. लेकिन उसका लाभ अभी तक किसी बड़े स्तर पर देखने को नहीं मिल रहा है.                           

अगर चुनावी नजर से देखे तो देश की आबादी में करीब 65 प्रतिशत युवा हैं और वोटबैंक के रूप में किसी भी चुनावी पार्टी की किस्मत बदल सकते हैं. विपक्ष भी इस मुद्दे से अच्छी तरह वाकिफ है और वो इस मुद्दे को सरकार की बड़ी नाकामी बताकर वो जनता के बीच जाना चाहती है. लेकिन अब सबकी निगाहें इन पर ठीक है कि 2014 की तरह इस बार भी बीजेपी का साथ देंगे या किसी ओर पर भरोसा करेंगे.

महागठबंधन बनेगा मोदी लहर की काट!

'महागठबंधन' आजाद भारत में पहली बार शायद उस वक्त अस्तित्व में आया, जब 1970 के दौर में कांग्रेस काफी मजबूत हुआ करती थी, जिसे टक्कर देने के मकसद से एक छत के नीचे 'जनता दल' का उदय हुआ था. लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी हैं और बीजेपी नीत एनडीए केंद्र समेत 20 से अधिक राज्यों की सत्ता में है और फिलहाल कांग्रेस की हालत काफी पतली है.

यही कारण है कि साल 2019 के चुनाव में महागठबंधन को मोदी सरकार की काट के तौर पर देखा जा रहा है. हाल में हुए उत्तर प्रदेश के उपचुनावों भी इस चीज की तसदीक भी करते हैं. जहां विपक्षी पार्टियों ने दिखा दिया कि अगर वो साथ आ जाएं तो बीजेपी के लिए जीतना कितना मुश्किल हो सकता है.   

लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि महागठबंधन का अस्तित्व में आना खुद में एक चुनौती है कांग्रेस के कमजोर होने से क्षेत्रीय दलों में बड़ा बनाने की होड़ सी मच गई है और कांग्रेस भी खुद को बड़े भाईया की भूमिका में देखना चाहती है. सीटों का बंटवारा भी एक पेचीदा मसला है.

ये बात बीजेपी के लिए राहत वाली है लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए.. कुछ नहीं कहा जा सकता..

एनडीए का घटता कुनबा...

(Photo: PTI)

बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना ने कुछ महीनों पहले यह ऐलान किया था कि वो आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ेंगी. फिलहाल राजनीतिक मजबूरियों के चलते दोनों की महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में हैं.  क्योंकि दोनों पार्टी दक्षिणपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखती हैं, तो ऐसे में वोट बंटाने का भी खतरा है. लेकिन साल लोकसभा चुनाव के आस पास महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव होने हैं तो ऐसे में दोनों एक साथ गठबंधन में लड़ेंगी यह कहना मुश्किल है.  

वहीं नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री उम्मीदवारी पर सबसे पहले समर्थन करने वाले टीडीपी के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू थे. लेकिन वो भी आंध्र प्रदेश का विशेष राज्य के मुद्दे पर बीजेपी से अलग हो गए.

क्षेत्रीय दलों का ऐसा आरोप रहता है कि बीजेपी उनको कमजोर करना चाहती है .आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य ना मिलने पर चंद्रबाबू ने खुद को ठगा हुआ पाया, लिहाजा उन्होंने अलग होना ही पार्टी के लिए बेहतर समझा.

दूसरी तरफ जैसा कि देश में क्षेत्रवाद की राजनीति हावी होती जा रही है तो अगले कुछ महीनों में हमें कुछ चौंकाने वाले समीकरण देखने को मिल सकते हैं.

एनडीए के कुनबे में हाल ही में वापसी करने वाले नीतीश कुमार भी कई मौकों पर बागी तेवर अपना चुके हैं और पंजाब के अकाली दल ने पहले ही अपनी असंतोष व्यक्त की हुई है. कुल मिलकर बीजेपी को बहुत जगह काम करने की जरूरत है  

ऐसी परिस्थिति में बीजेपी के लिए नए और दमदार सहयोगी ढूंढना मुश्किल हो जाएगा. जिसका ख़ामियाज़ा उसे 2019 में भुगतना पड़ा सकता है...

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