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हार्दिक पटेल को SC से लगा 'सुप्रीम' झटका, सजा के निलंबन पर तत्काल सुनवाई से इनकार

Written By Press Trust of India (भाषा) | Mumbai | Published:

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल की गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें 2015 के विसपुर दंगा मामले में उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगाने को अस्वीकार कर दिया गया था।
 
न्यायमूर्ति अरुण मिश्र के नेतृत्व वाली पीठ के समक्ष इस मामले का तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख किया गया था। पीठ में न्यायमूर्ति एम एम शांतानागोदर और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा भी शामिल हैं। 
 
 पटेल की ओर से पेश हुए वकील से पीठ ने कहा कि इस याचिका पर तत्काल सुनवाई की जरुरत नहीं है क्योंकि उच्च न्यायालय का आदेश पिछले साल अगस्त में आया था।
 
पीठ ने इस याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा, ‘‘आदेश अगस्त 2018 में पारित हुआ था। अब तत्काल सुनवाई की क्या जरुरत है?’’ 
पटेल ने उच्च न्यायालय के 29 मार्च के आदेश को चुनौती देते हुए सोमवार को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उच्च न्यायालय का फैसला उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की राह में बाधा डाल रहा है। 

पटेल (25) ने 12 मार्च को कांग्रेस में शामिल होने के बाद पार्टी के टिकट पर जामनगर से चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी थी। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख चार अप्रैल है।
 
गुजरात में 26 लोकसभा सीटों के लिए मतदान 23 अप्रैल को होगा।

मेहसाणा जिले के विसनगर स्थित सत्र अदालत ने पाटीदार कोटा आंदोलन के दौरान 2015 में विसनगर शहर में दंगों और आगजनी के लिए गत जुलाई में पटेल को दो साल की जेल की सजा सुनाई थी।
 
उच्च न्यायालय ने अगस्त 2018 में सजा निलंबित कर दी लेकिन दोषसिद्धि निलंबित नहीं की।

जन प्रतिनिधित्व कानून और इससे संबंधित उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के अनुसार दो साल या उससे ज्यादा की जेल की सजा का सामना कर रहा दोषी तब तक चुनाव में खड़ा नहीं हो सकता जब तक उसकी दोषसिद्धि पर रोक ना लग जाए।

उच्च न्यायालय में राज्य सरकार ने कहा था कि पटेल के खिलाफ राजद्रोह की दो शिकायतों समेत 17 प्राथमिकियां दर्ज हैं।

उच्च न्यायालय ने पटेल के वकीलों की उस दलील को खारिज कर दिया कि अगर दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई गई तो इससे ‘‘अपूरणीय क्षति’’ होगी क्योंकि उनका इरादा लोकसभा चुनाव लड़ने का है।

आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि दुर्लभ और असाधारण मामलों में दोषसिद्धि पर रोक लगाई जा सकती है और यह मामला इस श्रेणी में नहीं आता।
 

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