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मृणल सेन - सामाजिक सरोकार से जुड़ा फिल्मकार

Written By Digital Desk | Mumbai | Published:

कोलकाता - महान फिल्मकार मृणाल सेन ने एक दफा कहा था कि उन्हें नहीं पता कि ‘यह सब कहां समाप्त होगी’, लेकिन उनकी प्रयोग करने की इच्छा बरसों-बरस बदस्तूर जारी रही. 

सत्यजीत रॉय और ऋत्विक घटक के साथ सेन निर्देशन के क्षेत्र की तिकड़ी में से एक थे. प्रयोगधर्मी माने जाने वाले सेन ने एक बार कहा था कि अगर कोई चीज उन्हें हरदम जीवंत बनाये रखती है तो वह है अधिक से अधिक फिल्में बनाने की इच्छा.

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित फिल्म निर्देशक सेन का आयु संबंधी बीमारी से लंबे संघर्ष के बाद रविवार को 95 साल की उम्र में निधन हो गया.  वह फिल्मों में मानवतावादी दृष्टिकोण रखते थे. उनकी ‘नील आकाशेर नीचे’, ‘भुवन शोम’, ‘एक दिन अचानक’, ‘पदातिक’ और ‘मृगया’ जैसी फिल्मों ने उन्हें भारत में ‘नयी लहर’ की फिल्मों का प्रणेता बना दिया. 

सेन का मानना था कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि इसे लोगों को शिक्षित और प्रबुद्ध बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है. सेन मानते थे कि वह संयोगवश फिल्मकार बन गये हैं. 

उन्होंने 60 साल लंबे अपने फिल्मी सफर में 30 से अधिक फिल्में बनायी. इसके साथ कई फिल्मों के लिए पटकथा लेखन और निर्माण का कार्य किया.

पद्म भूषण से सम्मानित सेन की पहली फिल्म ‘रात भर’ (1955) और इसके बाद ‘नील आकाशेर नीचे’ (1959) ने कुछ अधिक खास असर नहीं पैदा किया लेकिन 1960 में उनकी फिल्म ‘बैशे श्रावणा’ ने उन्हें सामाजिक सरोकार से जुड़े फिल्मकार के रूप स्थापित कर दिया. 

उनकी फिल्में ‘एक दिन अचानक’ और ‘महापृथ्वी’ प्रबल व्यवस्था विरोधी तो नहीं थी बल्कि इसमें सामाजिक मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था पर बड़े और गहरे सवाल खड़े किए गए थे. 

‘ओका ओरी कथा’ एकमात्र तेलुगु फिल्म थी जिसका निर्माण सेन ने किया. यह मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी ‘कफन’ पर आधारित थी. ‘मृगया’ में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती को पहली दफा अभिनय का मौका दिया था. 

सेन ने एक दफा न्यूज एजेंसी के साथ साक्षात्कार में कहा था कि उनके कार्य में उनकी पूरी उर्जा खर्च हो जाती है  उन्होंने कहा था, ‘‘एक फिल्म के निर्माण के बाद मुझे लगता है कि मैं खत्म हो गया हूं, लेकिन मैं फिर से उठ खड़ा होता हूं.’’ 

यह बात उस वक्त कही जब वह अपनी अंतिम फिल्म ‘आमार भुवन’ (2002) की शूटिंग कर रहे थे. इस फिल्म में समाज के एक भाग में सहिष्णुता और बहुलवाद के मुद्दे को उठाया गया था. 

हिन्दी और बांग्ला फिल्मों में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले. उन्हें ‘कोलकाता एकतोर’, ‘जिनेसिस’, ‘खारिज’, ‘एक दिन प्रति दिन’, ‘आकालेर संधाने’, ‘खंडहर’ और ‘अंतरीन‘ के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

उनकी फिल्म ‘खारिज’ खास तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना बटोरी. इसे 1983 में कान, वेनिस, बर्लिन, कारलोवी वैरी फिल्मोत्सवों में ज्यूरी पुरस्कारों से नवाजा गया.

फिल्मों में उनके योगदान के लिए फ्रांस सरकार ने उन्हें ‘कमांडर ऑफ द आर्डर ऑफ आर्ट एंड लेटर्स’ के पुरस्कार से नवाजा था. सेन का जन्म 14 मई 1923 में बांग्लादेश के फरीदपुर में हुआ था. 

सेन राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष रहे और भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष भी रहे. वह 1998 से 2003 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. 

( इनपुट - भाषा से )


 

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